3 जुलाई – परमपूज्य गुरुदेव श्री निखिलेश्वरानन्द परमहंस जी की महासमाधि दिवस

आज (3 जुलाई): परमपूज्य गुरुदेव श्री निखिलेश्वरानन्द परमहंस जी की महासमाधि दिवस
आर्ष विद्या समाजम् के संस्थापक एवं निदेशक आचार्यश्री मनोज जी महाराज, पूज्य गुरुदेव श्रीमाली जी के शिष्य हैं। हमारे शास्त्रों में जिन परा एवं अपरा विद्याओं का केवल संकेत मात्र मिलता है, उनके पोषण और पुनरुद्धार करने में पूज्य गुरुदेव का अद्वितीय योगदान रहा है। आचार्यश्री मनोज जी महाराज को गुरुदेव से शक्तिपात दीक्षा भी प्राप्त हुई है।
21 अप्रैल 1933 को राजस्थान के जोधपुर के एक गाँव में पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में पंडित मुल्तान चंद श्रीमाली जी और रूपा देवी के पुत्र के रूप में जन्मे नारायण दत्त श्रीमाली जी ही आधुनिक विश्व के ऋषि श्रेष्ठ संपूज्य स्वामी निखिलेश्वरानंद परमहंस बने! बीसवीं सदी के महाऋषि थे श्रीमाली जी!
भगवती देवी से छोटी उम्र में विवाह करना पड़ा था, फिर भी श्रीमाली जी का मन ज्ञान-विज्ञान की खोज में ही लगा रहता था। उन्होंने उन महाविद्याओं को प्राप्त करने का संकल्प लिया जो सामान्य जन के लिए अप्राप्य थीं। क्या हमारे भारतीय शास्त्रों में वर्णित सभी बातें सत्य हैं? इन्हें प्रामाणिक रूप से कहाँ से सीखा जा सकता है? ऐसे ही प्रश्नों और विचारों में निमग्न होकर, सत्य की खोज के लिए उन्होंने गृह त्याग कर दिया। इसके पश्चात उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और अनेक गुरुओं की खोज में भटकते रहे। उनमें से कई मिथ्या और आडंबरपूर्ण भी निकले। कुछ आचार्य ऐसे भी थे, जिन्होंने उन्हें अत्यंत कठोर कष्ट दिए और कठोर अनुशासन के माध्यम से परीक्षा ली। उनमें से कई मिथ्या और आडंबरपूर्ण भी निकले। कुछ आचार्य ऐसे भी थे, जिन्होंने उन्हें अत्यंत कठोर कष्ट दिए और कठोर अनुशासन के माध्यम से परीक्षा ली। असंख्य कठोर कष्टों और यातनाओं के पश्चात उन्हें योग्य गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ और वे सच्चे ज्ञान को अर्जित कर सके। ऋषिमंडल के सिद्धाश्रम के परमाचार्य, परम पूज्य सद्गुरु स्वामी सच्चिदानंद परमहंस के शिष्य बनने के उपरांत उन्होंने समस्त ज्ञान-विज्ञान में पारंगतता प्राप्त की!
बीस वर्षों की कठोर तपश्चर्या के बाद सिद्धि प्राप्त कर, गुरु श्री सच्चिदानंद परमहंस की विशेष आज्ञा से वे पुनः गृहस्थाश्रम का पालन करने हेतु अपने घर लौट आए। गृह लौटने के पश्चात उन्होंने हिंदी अध्यापक के रूप में भी कार्य किया। भगवती देवी और श्रीमाली जी के यहाँ तीन पुत्रों का जन्म हुआ—नंदकिशोर श्रीमाली, कैलाशचंद्र श्रीमाली तथा अरविंद श्रीमाली।
लुप्तप्राय भारतीय ज्ञान-विज्ञान को पुनर्जीवित कर तथा विद्यमान ज्ञान को अनुसंधान और तपस्या के माध्यम से पूर्ण शास्त्र के रूप में प्रस्तुत करने वाले, श्रीमाली जी बीसवीं सदी के महान ऋषि थे। भारतीय सांस्कृतिक और वैज्ञानिकी परंपरा, सनातन धर्म की शिक्षाओं तथा गूढ़ ज्ञान की विभिन्न धाराओं को प्रकाशित और प्रखर बनाने वाला उनका व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण था। क्रियायोग के रूप में प्रसिद्ध क्रिया कुंडलिनी योग, भारतीय सम्मोहन विज्ञान, मंत्र-तंत्र-यंत्र विद्या, हस्तरेखा शास्त्र, ज्योतिष, अंक ज्योतिष, प्राण विद्या, पारद विज्ञान, स्वर्ण तंत्र, आयुर्वेद तथा सूर्य विज्ञान जैसी गूढ़ ज्ञान-विज्ञान की विधाओं को जनसुलभ बनाने हेतु श्रीमाली जी ने निरंतर प्रयास किया। 1981 में उन्होंने “मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान” नामक पत्रिका का शुभारंभ किया। साथ ही, उन्होंने “सिद्धाश्रम साधक परिवार” नामक संगठन की भी स्थापना की। वे उन दिव्य विद्याओं को, जो भ्रांतियों और अज्ञानता के कारण सामान्य जन के लिए दुर्लभ और अप्राप्य मानी जाती थीं, विधिवत रूप से जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए सदैव तत्पर रहे।
श्रीमाली जी अनेक देशों को सम्मिलित करने वाले वर्ल्ड एस्ट्रोलॉजी कॉन्फ़्रेंस के अध्यक्ष रहे। उन्हें 1987 में “तंत्र शिरोमणि”, 1988 में “मंत्र शिरोमणि” की उपाधियाँ प्राप्त हुईं। 1982 में भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. बी. डी. जत्ती ने उन्हें “महामहोपाध्याय” की उपाधि से सम्मानित किया। 1989 में भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें “समाज शिरोमणि” सम्मान प्रदान किया। 1991 में नेपाल के प्रधानमंत्री भट्टराई ने भी उनके उत्कृष्ट सामाजिक एवं आध्यात्मिक योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया।
Meditation, Power of Tantra, Practical Hypnotism , Practical Palmistry, Essence of Sakthipat, Ten Mahavidyas, Gopaniya Durlabh Mantrom Ke Rahsya, Himalaya Ke Yogiyom Ki Siddhian, Shishyopanishad, Durlabhopanishad जैसे अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों सहित श्रीमाली जी ने हिंदी और अंग्रेज़ी में विपुल साहित्य की रचना की है।
3 जुलाई 1998 को महासमाधि को प्राप्त हमारे परमगुरु, संपूज्य गुरुदेव श्रीमाली जी, अर्थात् स्वामी निखिलेश्वरानंद परमहंस जी के पावन श्रीचरणों में शत-शत कोटि प्रणाम।
सादर,
आर्ष विद्या समाजम्