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आज 21-04-2026 : श्रीशंकर जयंती

AVS

स्वामियों का जन्मदिवस केरल में “तत्त्वज्ञान दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

अज्ञान, विचारों के प्रदूषण और विकृतियों के घोर अंधकार में डूबी भारतभूमि का ज्ञानसूर्य बनकर पुनरुद्धार करने वाले श्री शंकराचार्य स्वामी जी का आज जन्मदिवस है। सनातन धर्म के तत्त्वदर्शनों एवं विभिन्न साधना-परंपराओं के आचार्य और व्याख्याता श्री शंकर ने केवल 32 वर्षों के अल्प जीवन में ही समस्त विश्व के “श्री शंकराचार्य” — जगद्गुरु के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की।

संशुद्ध जीवन जीने वाले शिवगुरु एवं आर्याम्बा की निरंतर प्रार्थनाओं का दिव्य फल स्वयं श्री परमेश्वर का वरदान—श्री शंकर के रूप में प्रकट हुआ।

स्वामी जी का जीवनकाल सामान्यतः CE 788 से 820 के बीच माना जाता है। भारत के अनेक स्थानों पर श्री शंकर जयंती 6 अप्रैल को मनाई जाती है, जबकि केरल में मेष मास के आर्द्र नक्षत्र के दिन इसका आयोजन होता है। केरल ने विश्व को जो सर्वोच्च प्रतिभा और परम आचार्य प्रदान किए, वे थे जगद्गुरु श्री शंकराचार्य।

बौद्ध और जैन मतों तथा उनके दार्शनिक प्रभावों के निरंतर आक्रमण से स्वयं की रक्षा करने में असमर्थ होकर निराश हो चुके सज्जनों के संरक्षण तथा सनातन धर्म के पुनर्स्थापन हेतु श्री शंकर का अवतरण मानो मृतसंजीवनी के समान हुआ। दार्शनिक एवं धार्मिक तुलनात्मक चर्चाओं के माध्यम से उन्होंने सनातन धर्म के गौरव को पुनः प्रतिष्ठित किया तथा अद्वैत वेदान्त को युक्तिसंगत एवं सुदृढ़ व्याख्या प्रदान की। संवादों के दौरान श्री शंकर द्वारा उद्धृत पूर्वपक्ष के श्लोकों के माध्यम से ही कालांतर में लुप्तप्राय हो चुकी अनेक दार्शनिक परंपराओं के विचार आज भी संरक्षित रह सके हैं—जैसे कि लोकायत। दर्शन, तत्त्वचिंतन और धर्म के क्षेत्र में श्री शंकर द्वारा प्रस्तुत विचारों पर उस समय से लेकर आज तक गहन अध्ययन एवं चर्चाएँ—समर्थन और विरोध, दोनों रूपों में—निरंतर होती आ रही हैं। ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और उपनिषदों पर उनके भाष्यों से प्रारंभ हुए संवाद आज तक निरंतर जारी हैं; अद्वैत चिंतन परंपरा को सार्वलौकिक स्वीकृति और मान्यता दिलाने में स्वामी जी की सफलता निर्विवाद है।

अत्यंत सूक्ष्म बुद्धि से ही ग्रहण किए जा सकने वाले दार्शनिक विमर्श सामान्य जन के आध्यात्मिक उन्नयन के लिए पर्याप्त नहीं हैं—इस तथ्य को समझते हुए, श्री शंकर ने अनेक दिव्य स्तोत्रों की रचना के साथ-साथ परमशिव, आदिशक्ति, गणपति, स्कन्द, विष्णु एवं सूर्य की उपासना हेतु षण्मत परंपरा की स्थापना की। इसके साथ ही, उन्होंने दशनामी परंपरा के माध्यम से संन्यास को व्यवस्थित रूप प्रदान किया तथा सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कांची कामकोटि पीठ सहित चार प्रमुख मठों की स्थापना की—उत्तर में बदरी का ज्योतिर्मठ, पश्चिम में गुजरात का द्वारका पीठ, दक्षिण में श्रृंगेरी का शारदा पीठ और पूर्व में पुरी का गोवर्धन मठ। इन मठों के लिए उन्होंने अपने चार प्रमुख शिष्यों को आचार्य पद पर स्थापित किया और इस प्रकार राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने में भी श्री शंकराचार्य का महान योगदान रहा।

भाष्यों के अतिरिक्त उन्होंने दिव्य स्तोत्रों सहित तीन सौ से अधिक स्वतंत्र ग्रंथों की रचना की। समस्त भारतवर्ष का भ्रमण कर विद्वानों एवं चिंतकों को सत्य का बोध कराने वाली उनकी शंकर दिग्विजय ने उन्हें सर्वज्ञपीठ पर प्रतिष्ठित किया और विश्व ने उन्हें “जगद्गुरु” के रूप में स्वीकार किया।

हमारे जीवन का परम लक्ष्य क्या है? सांसारिक और पारलौकिक उपलब्धियों से परे शाश्वत सफलता कैसे प्राप्त की जाए? सनातन धर्म पर आधारित जीवन कैसे जिया जाए?—ऐसे जीवनोन्मुख गहन प्रश्नों और विचारों को जन-जन तक पहुँचाने में उस ज्ञानावतार कर्मयोगी को सफलता प्राप्त हुई।

सदाशिव समारम्भाम्
शंकराचार्य मध्यमाम्
अस्मदाचार्य पर्यन्ताम्
वन्दे गुरुपरम्पराम् ॥
 
श्री शंकर जयंती के पावन अवसर पर उस परमगुरु के पावन चरणकमलों में आर्ष विद्या समाज शत-कोटि प्रणाम अर्पित करता है।
नमामि भागवतपाद शंकरम लोकशंकरम
 
सादर,
आर्ष विद्या समाजम