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आज (19 फरवरी) श्रीरामकृष्ण परमहंस जयंती

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आज (19 फरवरी) श्रीरामकृष्ण परमहंस जयंती

आधुनिक भारत के महान आध्यात्मिक आचार्यों में श्रीरामकृष्ण परमहंस का स्थान अत्यंत विशिष्ट और गौरवपूर्ण था। (जन्म – 17 फ़रवरी 1836, महासमाधि – 16 अगस्त 1886) हिंदू कैलेंडर के अनुसार वर्ष 2026 में 19 फ़रवरी को जयंती समारोह आयोजित किए जाएंगे।

कोलकाता के निकट हुगली ज़िले के कमारपुकुर नामक गाँव में, एक ब्राह्मण परिवार में 17 फ़रवरी 1836 को श्रीरामकृष्ण परमहंस का जन्म हुआ। उनके माता-पिता क्षुदिराम चट्टोपाध्याय और चंद्रमणि देवी थे। पूर्वाश्रम में उनका नाम गदाधर था, और वे स्नेहपूर्वक “गदाई” नाम से भी जाने जाते थे।

बाल्यकाल से ही गदाधर में सांसारिक जीवन के प्रति वैराग्य स्पष्ट था। उन्हें लौकिक आकर्षणों से अधिक आध्यात्मिक चिंतन और साधना में लीन रहना प्रिय था। पिता के मृत्यु के बाद गदाधर को कोलकाता के विभिन्न मंदिरों में पुजारी के रूप में कार्य करना पड़ा। परिवार के दबाव, उन्होंने 24 वर्ष की आयु में उस समय की प्रचलित परंपरा के अनुसार पाँच वर्षीया शारदा देवी से विवाह किया। 1866 में उन्होंने दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुजारी के रूप में सेवा प्रारंभ की।

एक बार भी माँ काली के दर्शन प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा गदाधर के हृदय में उमड़ रही थी। वर्षों तक कठोर तपस्या करने के बाद भी जब दर्शन प्राप्त नहीं हुए, तो गदाधर मृत्यु का वरण करने को उद्यत हो गए। उसी क्षण करुणामयी माँ काली उनके सम्मुख प्रकट हुईं और उन्हें दिव्य दर्शन प्रदान किए! जगत्‌जननी के प्रत्यक्ष दर्शन के पश्चात ही उन्हें योग्य गुरुओं को प्राप्त हुआ।

तंत्र संप्रदाय में भैरवी ब्राह्मणी और योग-वेदांत के क्षेत्र में तोटापुरी उनके गुरु बने। उनसे दीक्षा ग्रहण कर उन्होंने और भी श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधनाओं का अभ्यास किया। श्रीरामकृष्ण परमहंस को यह असाधारण क्षमता थी कि वे जो कुछ भी सीखते, उसे अपने जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में परखते और फिर उसी सत्य को अत्यंत सरल एवं सहज भाषा में दूसरों को समझा देते थे। पूर्णत: विरक्त स्वभाव के श्रीरामकृष्ण परमहंस ने विवाह तो किया, किंतु उन्होंने दाम्पत्य जीवन का पालन नहीं किया। माँ काली को अपनी जननी मानकर उपासना करने वाले श्रीरामकृष्ण परमहंस के लिए उनकी पत्नी शारदा देवी भी माँ काली के ही दिव्य स्वरूप के समान थीं।

1881 में उनसे मिलने आए नरेंद्र नामक एक तर्कशील युवक को संन्यासी स्वामी विवेकानंद में रूपांतरित कर देना श्रीरामकृष्ण परमहंस की अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति का ही प्रमाण था। ईश्वरसाक्षात्कार के लिए मत नहीं, बल्कि कर्म ही प्रधान हैं—ऐसा मानने वाले श्रीरामकृष्ण परमहंस मत की सीमाओं से परे सार्वभौमिक आध्यात्मिकता के समर्थक और प्रवक्ता थे। श्रीरामकृष्ण परमहंस के शिष्यों में प्रमुख स्थान उस नरेंद्रनाथ दत्त का था, जो आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के रूप में विश्वविख्यात हुए। गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस के सनातन धर्म संबंधी उपदेशों से आकृष्ट होकर नरेंद्र ने 1887 में संन्यास स्वीकार किया; इसी के पश्चात वे स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए।

गुरु परमहम्स के प्रति आदर और श्रद्धा व्यक्त करने हेतु ही स्वामी विवेकानन्द ने श्रीरामकृष्ण मठ की स्थापना की। गाँव-गाँव में रहने वाले भूखे-प्यासे गरीबों और शोषित-पीड़ित लोगों की भूख मिटाने, उन्हें आवश्यक शिक्षा प्रदान करने तथा उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से 1 मई 1897 को श्रीरामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की गई। आज भारत के लगभग सभी राज्यों में तथा अनेक विदेशी देशों में रामकृष्ण मिशन का व्यापक विस्तार हो चुका है और वह अपने सेवा-कार्य का प्रकाश फैला रहा है। गरीबों और असहायों के उत्थान के साथ-साथ धर्मों के बीच सद्भाव और एकता को बढ़ावा देना भी रामकृष्ण मिशन के प्रमुख उद्देश्यों में से एक था।

संसार-भर में फैले रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय, बेलूर मठ, पश्चिम बंगाल के हावड़ा में स्थित है। सर्वोच्च सेवा-कार्यों की मान्यता के रूप में 1998 में भारत सरकार द्वारा रामकृष्ण मिशन को 1 करोड़ रुपये की राशि और प्रशस्ति-पत्र सहित गांधी पीस अवार्ड प्रदान किया गया।

लाखों लोगों को आध्यात्मिक पथ और ईश्वरीय अनुभूतियों की ओर मार्गदर्शन प्रदान करने वाले महागुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस के त्रिपादकमलों में हम शत-शत कोटि प्रणाम अर्पित करते हैं।

इस श्रीरामकृष्ण जयंती के पावन अवसर पर हम यह प्रतिज्ञा करें कि सनातन धर्म के
अध्ययन, अनुष्ठान, प्रचार, अध्यापन और संरक्षण – इन पंचमहाकर्तव्यों का हम पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ सही रूप में निर्वहन करेंगे।
श्रीरामकृष्ण जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ…
सस्नेह,
आर्ष विद्या समाजम