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संपूज्य गुरुदेव श्री निखिलेश्वरानंद परमहंस जी का जन्मदिवस 21-04-2026

AVS

21 अप्रैल 1933 को राजस्थान के जोधपुर के एक गाँव में पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में पंडित मुल्तान चंद श्रीमाली जी एवं रूपा देवी के सुपुत्र के रूप में जन्मे नारायण दत्त श्रीमाली जी ही आगे चलकर आधुनिक युग के ऋषिश्रेष्ठ, परम पूज्य स्वामी निखिलेश्वरानंद परमहंस बने। श्रीमाली जी बीसवीं सदी के महान ऋषि थे।

यद्यपि उन्हें अल्पायु में ही भगवती देवी से विवाह करना पड़ा, तथापि श्रीमाली जी का मन ज्ञान-विज्ञान की साधना में ही निरंतर प्रवृत्त रहा। वे उन महाविद्याओं की प्राप्ति हेतु समर्पित रहे, जो सामान्य जन के लिए दुर्लभ थीं।

क्या हमारे भारतीय शास्त्रों में वर्णित सभी बातें सत्य हैं? इन्हें प्रामाणिक रूप से कहाँ से सीखा जा सकता है? ऐसे ही प्रश्नों और विचारों में निमग्न होकर, सत्य की खोज के लिए उन्होंने गृह त्याग कर दिया। इसके पश्चात उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और अनेक गुरुओं की खोज में भटकते रहे। उनमें से कई मिथ्या और आडंबरपूर्ण भी निकले। कुछ आचार्य ऐसे भी थे, जिन्होंने उन्हें अत्यंत कठोर कष्ट दिए और कठोर अनुशासन के माध्यम से परीक्षा ली। असंख्य कठोर कष्टों और यातनाओं के पश्चात उन्हें योग्य गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ और वे सच्चे ज्ञान को अर्जित कर सके। ऋषिमंडल के सिद्धाश्रम के परमाचार्य, परम पूज्य सद्गुरु स्वामी सच्चिदानंद परमहंस के शिष्य बनने के उपरांत उन्होंने समस्त ज्ञान-विज्ञान में पारंगतता प्राप्त की। बीस वर्षों की कठोर तपश्चर्या के बाद सिद्धि प्राप्त कर, गुरु श्री सच्चिदानंद परमहंस की विशेष आज्ञा से वे पुनः गृहस्थाश्रम का पालन करने हेतु अपने घर लौट आए। गृह लौटने के पश्चात उन्होंने हिंदी अध्यापक के रूप में भी कार्य किया। भगवती देवी और श्रीमाली जी के यहाँ तीन पुत्रों का जन्म हुआ—नंदकिशोर श्रीमाली, कैलाशचंद्र श्रीमाली तथा अरविंद श्रीमाली।

लुप्तप्राय भारतीय ज्ञान-विज्ञान को पुनर्जीवित कर तथा विद्यमान ज्ञान को अनुसंधान और तपस्या के माध्यम से पूर्ण शास्त्र के रूप में प्रस्तुत करने वाले, श्रीमाली जी बीसवीं सदी के महान ऋषि थे। भारतीय सांस्कृतिक और वैज्ञानिकी परंपरा, सनातन धर्म की शिक्षाओं तथा गूढ़ ज्ञान की विभिन्न धाराओं को प्रकाशित और प्रखर बनाने वाला उनका व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण था। क्रियायोग के रूप में प्रसिद्ध क्रिया कुंडलिनी योग, भारतीय सम्मोहन विज्ञान, मंत्र-तंत्र-यंत्र विद्या, हस्तरेखा शास्त्र, ज्योतिष, अंक ज्योतिष, प्राण विद्या, पारद विज्ञान, स्वर्ण तंत्र, आयुर्वेद तथा सूर्य विज्ञान जैसी गूढ़ ज्ञान-विज्ञान की विधाओं को जनसुलभ बनाने हेतु श्रीमाली जी ने निरंतर प्रयास किया। 1981 में उन्होंने “मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान” नामक पत्रिका का शुभारंभ किया। साथ ही, उन्होंने “सिद्धाश्रम साधक परिवार” नामक संगठन की भी स्थापना की। वे उन दिव्य विद्याओं को, जो भ्रांतियों और अज्ञानता के कारण सामान्य जन के लिए दुर्लभ और अप्राप्य मानी जाती थीं, विधिवत रूप से जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए सदैव तत्पर रहे।

अनेक देशों की सहभागिता वाले वर्ल्ड एस्ट्रोलॉजी कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष के रूप में श्रीमाली जी ने प्रतिष्ठित भूमिका निभाई। उन्हें 1987 में “तंत्र शिरोमणि” तथा 1988 में “मंत्र शिरोमणि” जैसी विशिष्ट उपाधियों से सम्मानित किया गया। 1982 में भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. बी. डी. जत्ती द्वारा उन्हें “महामहोपाध्याय” की उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया गया। इसके उपरांत, 1989 में भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें “समाज शिरोमणि” पुरस्कार से सम्मानित किया। 1991 में उनके उत्कृष्ट सामाजिक एवं आध्यात्मिक कार्यों के लिए नेपाल के प्रधानमंत्री भट्टाराई द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया।

Gurudev Sri Nikhileshwarananda Paramahamsa Ji
Meditation, Power of Tantra, Practical Hypnotism , Practical Palmistry,
Essence of Sakthipat, Ten Mahavidyas, Gopaniya Durlabh Mantrom Ke Rahsya, Himalaya Ke Yogiyom Ki Siddhian, Shishyopanishad, Durlabhopanishad जैसे अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों सहित श्रीमाली जी ने हिंदी और अंग्रेज़ी में विपुल साहित्य की रचना की है।
हमारे शास्त्रों में केवल संकेत रूप में विद्यमान परा एवं अपरा विद्याओं के संवर्धन में अद्वितीय स्थान रखने वाले पूज्य गुरुदेव श्रीमाली जी के शिष्य ही आर्ष विद्या समाज के संस्थापक एवं निदेशक आचार्य श्री मनोज जी हैं, जिन्हें उनसे शक्तिपात दीक्षा भी प्राप्त हुई है।
 
3 जुलाई 1998 को महासमाधि को प्राप्त हमारे परमगुरु, संपूज्य गुरुदेव श्रीमाली जी, अर्थात् स्वामी निखिलेश्वरानंद परमहंस जी के पावन श्रीचरणों में शत-शत कोटि प्रणाम।


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सादर,
आर्ष विद्या समाजम