आज, 5 जनवरी: श्री श्री परमहंस योगानंद जी की 133वीं जयंती।
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5 जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक बंगाली क्षत्रिय परिवार में योगानंद जी का जन्म हुआ। परिवार ने उन्हें मुकुंदलाल घोष नाम दिया। उनके पिता भगवतीचरण घोष और माता ज्ञानप्रभादेवी थीं।
श्री मुकुंदलाल जी भारतीय योगाचार्यों में प्रमुख श्री युक्तेश्वरगिरी महाराज के शिष्य बन गए। वहीं से उन्होंने योगदीक्षा प्राप्त की और परमहंस योगानंद के नाम से ईश्वर-गुरु-धर्म सेवा करते हुए अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की।
मनुष्य की चेतना की सुंदरता और श्रेष्ठता, उसके वास्तविक ईश्वरीय स्वरूप का अनुभव कराने तथा अपने जीवन में उसे स्पष्ट रूप से परिलक्षित कराने में विभिन्न वर्ग, वर्ण, गोत्र और मत विश्वासों के लोगों को, देश की सीमाओं से परे सहायता करने के लिए श्री परमहंस योगानंद जी ने अपनी संपूर्ण जीवन समर्पित कर दी। “God is realizable. You can know Him now through meditation” — यही उनका अत्यंत प्रभावशाली और ध्यानाकर्षक आह्वान था।
उनके सद्गुरु श्री युक्तेश्वर जी ने भविष्यवाणी की थी कि योगानंद जी का दिव्य दायित्व है भारत के प्राचीन ध्यानयोगमार्ग ‘क्रियायोग’ को पूरे विश्व में प्रचारित करना।
1920 में योगानंद जी ने बॉस्टन में आयोजित इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ़ रिलिजियस लिबरल्स (International Congress of Religious Liberals) के प्रतिनिधि के रूप में सेवा का निमंत्रण स्वीकार कर अमेरिका में गए। वहां उन्हें जनसहस्रों को आकर्षित करने वाले अनेक प्रभाषण और आध्यात्मिक भाषण देने के अवसर मिले। उन्होंने अनगिनत शिष्यों का मार्गदर्शन किया और लाखों अमेरिकियों को सनातन धर्म के मार्ग पर प्रेरित किया।
महागुरुपरंपराओं और अपने विचारों को प्रचारित करने के उद्देश्य से योगानंद जी ने 1917 में भारत में “योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इंडिया” (YSS) और 1920 में अमेरिका में “सेल्फ़ रियलाइज़ेशन फेलोशिप” (SRF) की स्थापना की। इन आध्यात्मिक संस्थाओं के माध्यम से उन्होंने भारत, यूरोप और अमेरिका में प्रसंग पर्यटन की, वास्तविक ध्यान केंद्रों की स्थापना की, आध्यात्मिक लेख लिखकर प्रकाशित किए, और योग मार्ग के दर्शन और ध्यान तकनीकों से आम जनता को परिचित कराया।
अनेक आध्यात्मिक कृतियों के रचनाकार योगानंद जी की प्रमुख रचना उनकी स्वयं की जीवनकथा है। उसमें 2000 वर्षों से आज भी जीवित, मृत्यु रहित योगीश्वर श्री महावतार बाबाजी सहित उनकी गुरुपरंपरा के दर्शन और जीवन स्वाभाविक रूप से समाहित हैं। विभिन्न भाषाओं में अनूदित यह आध्यात्मिक कृति पूरे संसार में करोड़ों लोगों को गहराई से प्रभावित कर चुकी है और आज भी उन्हें आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित कर रही है। यह विशिष्ट और अमूल्य पुस्तक “एक योगी की आत्मकथा” के नाम से हिंदी में भी उपलब्ध है।
1952 में श्री योगानंद जी ने लॉस एंजेल्स के आश्रम में महासमाधि प्राप्त की। लॉस एंजेल्स के मोर्चरी के डायरेक्टर हैरी. टी. रॉव द्वारा अमेरिकी सरकार को भेजे गए रिपोर्ट में यह अद्भुत घटना दर्ज है: “मेरे अधिकारी जीवन में यह निरीक्षण असाधारण था। योगानंद के निधन का दिन 7 मार्च 1952 था, फिर भी उनका शरीर 27 मार्च 1952 तक उसी ताजगी और पूर्णता के साथ मौजूद था!” यानी, अन्य लोगों की तरह श्री परमहंस योगानंद जी के मृतशरीर में कोई भी अपघट या क्षय नहीं हुआ। महायोगियों के अद्भुत चमत्कारों पर समय और स्थान की कोई सीमा नहीं होती।
आर्ष विद्या समाज के संस्थापक एवं निदेशक आचार्य श्री के. आर. मनोज जी की प्रमुख तीन आर्षगुरुपरंपराओं में श्री अगस्त्य महर्षि से शुरुआत श्री महावतार बाबाजी, श्री लाहिरी महाशय जी, श्री युक्तेश्वर जी, तथा श्री परमहंस योगानंद जी जैसे अनगिनत महायोगी संकलित हैं।
इस जन्मदिवस पर महागुरु श्री परमहंस योगानंद जी को शतकोटि प्रणाम।